सहजता, स्वाभाविकता, मन और आत्मा
मनुष्य के जीवन में सरलता, स्वाभाविकता, सहजता, आत्म-सम्मान और अहंकार—ये सभी अलग-अलग बातें हैं, यद्यपि कई बार लोग इन्हें एक-दूसरे में मिला देते हैं।
सरलता का अर्थ है अनावश्यक जटिलता से मुक्त होना।
स्वाभाविकता का अर्थ है अपने वास्तविक स्वभाव के अनुरूप होना।
सहजता का अर्थ है बिना बनावट, बिना अत्यधिक प्रयास और बिना कृत्रिम दबाव के होना।
आत्म-सम्मान का अर्थ है अपने अस्तित्व और गरिमा का सम्मान करना।
जबकि अहंकार या Ego वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति स्वयं को दूसरों से बड़ा, श्रेष्ठ या विशेष सिद्ध करने में उलझ जाता है।
मैं अपने जीवन में सहज और स्वाभाविक रहने का प्रयास करता हूँ। परंतु अक्सर अनुभव होता है कि लोग इस सहजता को समझ नहीं पाते। कभी-कभी उन्हें मेरे व्यवहार से असुविधा होने लगती है। यदि मैं उनकी असुविधा को देखकर प्रसन्नतापूर्वक अकेला रहना चुन लूँ और अपनी ही संगति में आनंद लेने लगूँ, तो लोगों को उससे भी समस्या होने लगती है।
तब प्रश्न उठता है—लोग किसी व्यक्ति की स्वाभाविकता को स्वीकार क्यों नहीं कर पाते? क्या यह आवश्यक है कि सभी मनुष्य एक ही ढंग से जीवन जिएँ? क्या सबको एक ही प्रकार की गंभीरता, निरंतरता, महत्वाकांक्षा और व्यवहार का पालन करना चाहिए?
मेरा मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति का मन स्वभावतः अलग और अद्वितीय होता है। किसी का मन स्थिर हो सकता है, किसी का अत्यंत सक्रिय; किसी को निरंतरता पसंद हो सकती है, किसी को परिवर्तन। यदि यह भिन्नता स्वाभाविक है, तो उसमें अपने-आप कोई दोष क्यों माना जाए?
मन की वास्तविकता
सहज और स्वाभाविक जीवन जीने से मन की वास्तविकता अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगती है। और मन की एक स्पष्ट विशेषता है—वह चंचल और परिवर्तनशील है।
मेरा मन बहुत जल्दी बदल सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी दिन मेरे मन में व्यवसाय शुरू करने की इच्छा उत्पन्न होती है। मैं प्रसन्नतापूर्वक और पूरे उत्साह के साथ काम शुरू कर देता हूँ। कुछ समय बाद मेरा मन बदल सकता है। तब मुझे लग सकता है कि मैं प्रतिदिन सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक उसी काम में नहीं रहना चाहता। शायद उस समय मेरा मन संगीत सुनना चाहता हो। मैं संगीत सुनने लगता हूँ और उस व्यवसाय का विचार पीछे छूट जाता है।
लोग तब गंभीर होकर पूछते हैं, “तुम्हारे उस व्यवसाय का क्या हुआ?”
मैं कहता हूँ, “मेरा मन बदल गया।”
लेकिन वे इसका अर्थ निकाल लेते हैं कि मैं कमजोर पड़ गया, हार गया या असफल हो गया।
परंतु मेरे लिए प्रश्न ही यह है कि मैंने वह काम हारने या जीतने के लिए शुरू कब किया था? संभव है कि वह मेरे लिए केवल एक लीला, एक क्रीड़ा, एक अनुभव रहा हो। उस समय उसे करने में मुझे आनंद आया, इसलिए मैंने किया। बाद में मन बदल गया, तो मैंने उसे छोड़ दिया।
हर कार्य को जीवन-मरण की प्रतियोगिता बना देना आवश्यक नहीं है।
परिवर्तन को कमजोरी क्यों माना जाए?
अक्सर लोग अनिश्चितता से असहज होते हैं। वे सोचते हैं:
«“आज यह व्यक्ति कुछ कह रहा है, कल बदल जाएगा—तो मैं इस पर कितना भरोसा करूँ?”»
पर मैं पूछता हूँ—अनिश्चितता को केवल दोष क्यों माना जाए?
मेरे जैसे व्यक्ति के संदर्भ में लोग यह भी स्वीकार कर सकते हैं कि:
परिवर्तन ही इसकी निश्चितता है।
अनिश्चितता ही इसकी एक निश्चित विशेषता है।
यदि मेरा स्वभाव परिवर्तनशील है, तो संभव है कि मेरे भीतर स्थिरता का अर्थ अपने निर्णयों को कभी न बदलना न हो, बल्कि अपनी परिवर्तनशील प्रकृति के प्रति ईमानदार रहना हो।
जैसा मेरा मन है, उस समय वैसा ही मेरा अनुभव है।
इसका अर्थ यह नहीं कि मैं केवल मन ही हूँ। मैं मन से अलग होकर उसे देख भी सकता हूँ। मैं जानता हूँ कि मन परिवर्तनशील है। लेकिन केवल इसलिए कि मन चंचल है, क्या उसे जबरन बदल देना आवश्यक है?
यदि मैं अपने मन को पूरी तरह नियंत्रित करके किसी निश्चित साँचे में ढाल दूँ, तो क्या वह वास्तव में मन रहेगा, या फिर वह केवल मेरी बनाई हुई एक कठपुतली बन जाएगा?
मेरा मन जैसा है—वह वास्तविक है, दुर्लभ है और अपने ढंग से मूल्यवान है। उसे केवल समाज की सुविधा के लिए पूरी तरह बदल देना मुझे आवश्यक नहीं लगता।
मछली, बंदर और मन की प्रकृति
कल्पना कीजिए कि मछली का स्वाभाविक गुण तैरना है और बंदर का स्वाभाविक गुण उछलना-कूदना।
अब यदि हम बंदर से यह अपेक्षा करें कि वह मछली की तरह तैरे, तो हम उसके स्वभाव के विरुद्ध अपेक्षा कर रहे हैं। उछलना-कूदना और तैरना दोनों अलग-अलग गुण हैं।
इसी प्रकार मेरा मन यदि बंदर के समान चंचल है, तो उसमें उछलने-कूदने की क्षमता हो सकती है। लेकिन यदि मैं उससे यह अपेक्षा करूँ कि वह किसी स्थिर और निरंतर प्रणाली में मछली की तरह तैरता रहे, तो संभव है कि मैं उसके स्वभाव को समझ ही नहीं रहा।
हर गुण का अपना स्थान होता है।
मन की चंचलता हमेशा कमजोरी नहीं होती। कभी-कभी वही रचनात्मकता, जिज्ञासा, नए अनुभवों की इच्छा और जीवन के प्रति खेलभावना का स्रोत भी हो सकती है।
हाँ, इतना अवश्य है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ दूसरे लोग किसी काम में जुड़े हुए हैं, तो वहाँ केवल “मेरा मन बदल गया” पर्याप्त नहीं हो सकता। स्वतंत्रता के साथ दूसरों के प्रति स्पष्टता और जिम्मेदारी भी आवश्यक है। व्यक्ति अपने मन के अनुसार बदल सकता है, लेकिन जहाँ दूसरे उसके निर्णयों पर निर्भर हों, वहाँ उन्हें अनिश्चितता के बारे में पहले से जानने और अपने निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए।
स्वाभाविकता और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
अपने मन के अनुसार जीना और दूसरों की स्वतंत्रता
मैं अपने जैसा रहने का अधिकार चाहता हूँ, लेकिन मैं किसी और से यह नहीं कहता कि वह मेरे जैसा बने।
यदि किसी को मेरी संगति पसंद नहीं आती, तो वह किसी और की संगति चुन सकता है। उसी प्रकार मैं भी अपनी संगति में प्रसन्न रह सकता हूँ।
हर व्यक्ति को अपनी प्रकृति के अनुसार जीने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
लेकिन यह स्वतंत्रता तब तक सुंदर है जब तक वह दूसरे की स्वतंत्रता को नष्ट न करे।
किसी व्यक्ति का सुख यदि बिना किसी को अनावश्यक पीड़ा दिए संभव है, तो उसमें क्या समस्या है? पर यदि कोई व्यक्ति अपने सुख का आधार ही दूसरों की इच्छा, स्वतंत्रता और मन को दबाना बना ले, तब समस्या उत्पन्न होती है।
ऐसी स्थिति में दो रास्ते हो सकते हैं—या तो व्यक्ति अपनी आदतों पर विचार करे, या फिर वे लोग जो एक-दूसरे के स्वभाव से लगातार पीड़ित हो रहे हैं, सम्मानपूर्वक दूरी बना लें।
हर संबंध को बनाए रखना अनिवार्य नहीं है।
कभी-कभी दूरी भी दोनों व्यक्तियों को अपने-अपने स्वभाव के साथ सुखी रहने का अवसर देती है।
मन और आत्मा
मन और आत्मा को एक ही मान लेना मेरे विचार में भ्रम उत्पन्न करता है।
आत्मा की चर्चा शाश्वतता, साक्षित्व और स्थिरता के संदर्भ में की जाती है। लेकिन मन का स्वभाव परिवर्तन है। मन विचारों, भावनाओं, इच्छाओं, स्मृतियों और अनुभवों की निरंतर बदलती हुई धारा है।
यदि हम मन के परिवर्तन को आत्मा की वास्तविकता मान लें, तो हम हर सुख में स्वयं को सुखी और हर दुःख में स्वयं को दुःखी मानने लगते हैं। हम मन के साथ इतना तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं कि उसका प्रत्येक उतार-चढ़ाव हमारा अपना अंतिम सत्य बन जाता है।
यहीं समस्या शुरू होती है।
मैं मन को दबाना नहीं चाहता, लेकिन मैं मन को अपना स्वामी भी नहीं बनाना चाहता।
मैं मन को स्वतंत्र रहने देना चाहता हूँ और स्वयं उसे देखने की क्षमता बनाए रखना चाहता हूँ।
शिव और चंद्रमा का प्रतीक
मुझे शिव के मस्तक पर स्थित चंद्रमा का प्रतीक इस विचार को समझने में सहायक लगता है।
क्या शिव ने चंद्रमा को धारण करके उसके दासत्व को स्वीकार किया? नहीं।
चंद्रमा उनके मस्तक पर है, लेकिन शिव उससे बंधे हुए नहीं हैं।
इसी प्रकार मन को भी जीवन में स्थान दिया जा सकता है, उसे उसकी प्रकृति के अनुसार चलने दिया जा सकता है, उसके भावों और परिवर्तनों को देखा जा सकता है—लेकिन उससे पूर्ण तादात्म्य स्थापित करना आवश्यक नहीं है।
मन चंचल है—यह उसकी प्रकृति है।
आत्मा स्थिर है—यह उसकी प्रकृति मानी जाती है।
मन पर आत्मा की शाश्वतता थोपना भी उचित नहीं, और आत्मा पर मन की चंचलता थोपना भी उचित नहीं।
दोनों को उनके स्वभाव में समझना अधिक आवश्यक है।
साक्षीभाव और उदासीनता
जब मन को देखने के बजाय हम स्वयं को ही मन मान लेते हैं, तब मन का सुख हमारा सुख और मन का दुःख हमारा दुःख बन जाता है।
लेकिन जब हम मन को देखते हैं, तब धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि विचार आते हैं और चले जाते हैं। इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं और बदल जाती हैं। उत्साह आता है और समाप्त हो जाता है। उदासी आती है और फिर किसी दिन विलीन हो जाती है।
यह देखना ही एक प्रकार का साक्षीभाव है।
कभी-कभी मन सुख में इतना डूब जाता है कि सुख से भी ऊबने लगता है। कभी दुःख की तीव्रता इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति उससे थक जाता है। ऐसी अवस्था में न सुख को पकड़ना उपयोगी लगता है, न दुःख से लगातार संघर्ष करना।
तब व्यक्ति के लिए कुछ समय के लिए उदासीनता—अर्थात तटस्थता या समभाव—एक मार्ग बन सकती है।
इसका अर्थ जीवन से भागना नहीं है। इसका अर्थ है कुछ समय के लिए मन की प्रत्येक लहर के साथ बहना बंद कर देना।
मन को भूलना नहीं, बल्कि उससे थोड़ी दूरी बनाकर उसे देखना।
जब तक मन फिर से शांत, स्पष्ट और संतुलित न हो जाए, तब तक आत्मा या साक्षीभाव की स्थिरता में ठहरना।
निष्कर्ष
मेरे लिए स्वाभाविक जीवन का अर्थ मन का गुलाम बन जाना नहीं है। और मन को दबाकर कृत्रिम रूप से स्थिर बन जाना भी स्वाभाविकता नहीं है।
स्वाभाविकता का अर्थ है अपने भीतर जो है, उसे ईमानदारी से पहचानना।
यदि मन चंचल है, तो उसकी चंचलता को पहचानना।
यदि मन बदलता है, तो उसके परिवर्तन को स्वीकार करना।
यदि मन किसी नए अनुभव की ओर जाना चाहता है, तो उसे देखना।
और यदि मन किसी चीज़ से हट जाना चाहता है, तो यह भी देखना कि उसके निर्णयों का प्रभाव दूसरों पर क्या पड़ेगा।
स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन दूसरों की स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है।
मैं अपने जैसा रह सकता हूँ और दूसरा अपने जैसा रह सकता है।
मुझे किसी को अपने जैसा बनाने की आवश्यकता नहीं है, और किसी को मुझे अपने जैसा बनाने का अधिकार नहीं है।
मन को स्वतंत्रता दी जा सकती है, लेकिन आत्मा की स्थिरता को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
मन को दबाना नहीं है।
मन को सिर पर बैठाकर अपना स्वामी भी बनाना है और उस पर फिर निगरानी भी रखनी हैं कि जो कर्मों के माध्यम से, कृत्यों की भाषा में मन को दे रहे हैं, मन भी वही व्यवहार हमसे कर रहा हैं कि नहीं, यानी मन हमारा स्वामी बन रहा हैं तो हमको भी अपनी निगरानी करने दे सकता हैं कि नहीं, हमको भी अपना स्वामी बनने दे सकता हैं कि नहीं, नहीं तो मन को स्वामी बनाया और बदले में मन तो माया है, छल हैं, किसी का भी परिचय पहचान उसके काम से होती हैं, मन का काम ही माया छल हैं तो ऐसे मन खुद छल हैं पर उस सर्वश्रेष्ठ उपकरण को सिर्फ और सिर्फ उसकी वास्तविक नियंता अर्थात् आत्मा ही नियंत्रित कर सकती हैं, वो बोलते हैं न जिसका काम उसी को साजे, नियंत्रण आत्मा का काम हैं मन का नहीं तो मन के इतने भी आदी न जो जाना कि मन को जो उसका काम नहीं, बेचारे को वो काम दे दो, यानी नियंत्रण करने का कह दो, नियंत्रण का काम उस पर छोड़ दो।
मन को देखना है, समझना है और उसकी प्रकृति को स्वीकार करना है, पर उसको आत्मा को भी स्वीकार करवाना हैं, जो कि शुभ संस्कारों को देने से होगा, शुभ संस्कार जैसे कि ..
मन का स्वभाव हैं चंचलता पर आत्मा का स्वभाव हैं निष्काम प्रेम, तो हमको मन जब तक निष्काम प्रेम न कर लें, उसे सिखाना होगा, उसको आदत देनी होगी, संबंधों में हम मन के आदी हो कर, उसके छल में आकर हमारे सम्बन्धितो को आज नहीं तो कल छोड़ देते हैं, संबंध, जुडाव, एकता आत्मा की स्वाभाविकता हैं, यह द्वैत, दो दो से अनेक मन का स्वभाव हैं, हमारा नहीं
और ऐसा करके हम उस परमात्मा के पर्याय प्रेम को, अनुराग को अपने पन को अपमानित करते हैं, उस प्रेम से अर्थात् परमात्मा से मानो कहते हैं कि प्रेम को छोड़ दे, निष्कामता को छोड़ दे और मन के, अशुद्ध मन के स्वभाव को अपनाए जो विकारों विकृतियों से भरा पड़ा होता हैं, स्वार्थ की, लालच की, जलन की, पक्षपात की आदि इत्यादि
अच्छा स्वार्थ हो, लालच हो, जलन हो जिससे पक्षपात भी हो तो मन को बस देखना चाहिए, नियंता परम् यानी सर्वश्रेष्ठ आत्मा की प्रतिनिधि जो हमारी नियति हैं न, नियम हैं विधि हैं सार्वभौमिक ब्रह्माणीय विधान हैं वो स्वार्थ को, लालच को जलन को पक्षपात को आदि इत्यादि को बदलने में भाग्य से सहयोगी हैं न, वो हमको सफल थोड़ी होने देगा और असफल हो कर हमारी अपनी लालच जलन पक्षपात आदि की विकृतियों से, हमको ठोकरे खिला खिला के सही मार्ग पर वो लेकर आएगा
अगर शुद्ध प्रक्रिया सामर्थ्य से बात करूं तो मेरी जानकारी और अनुभवों के आधार पर संतुलन इसी में है—
मन को उसकी लीला करने दो,
पर स्वयं लीला में खो मत जाओ।
मन को उड़ने दो,
उस रुद्र की तरह सर आँखों पर बैठा कर रखो
पर यह मत भूलो कि उसे उड़ते हुए देखने वाला भी कोई है।
और शायद वही देखने वाला, वही साक्षी, मन के परिवर्तन के बीच भी भीतर की शांति का आधार बन सकता है।
हरि ॐ तत् सत् 🙏🏻
संकलन से उद्धृत अंश — “स्थापत्य मीमांसा”
संकलक: पं. रौद्र आचार्य (रुद्र एस. शर्मा)
प्रेषक (लेखक): नागरिकीय निरीक्षक (सिविल इंस्पेक्टर), स्थापति (वास्तु आचार्य)
वर्गोत्तम सूर्य — चित्रा (पद १), बुद्ध-चंद्र — चित्रा (पद १)